| Kadve Pravachan | |||
| Krantikari Rashtrasant Munishri Tarun Sagar Ji Maharaj's Kadve Pravachan Articles | |||
| आचार्य श्री के कड़वे-प्रवचन के कुछ अंश | |||
| " लक्ष्मी पुण्याई से मिलती है | मेहनत से मिलती हो तो मजदूरों के पास क्यों नहीं ? बुद्दी से मिलती हो तो पंडितो के पास क्यों नहीं ?जिन्दगी मैं अच्छी संतान ,सम्पति और सफलता पुण्य मिलती है | अगर आप चाहते हैं की आपका इहलोक और परलोक सुखमय रहे तो पुरे दिन में कम से कम दो पुण्य जरुर करिए | क्योकि जिन्दगी में सुख , सम्पति और सफलता पुण्याई से मिलती हैं | " | |||
| " संसार में अड़चन और परेशानी न आये -यह कैसे हो सकता हैं | सफ्ताह मे एक दिन रविवार का भी तो आएगा ना | प्रक्रति का नियम ही ऐसा है की जिन्दगी मे जितना सुख -दुःख मिलना है ,वह मिलता ही है | मिलेगा भी क्यों नहीं , टेंडर मे जो भरोगे वाही तो खुलेगा | मीठे के साथ नमकीन जरुरी है तो सुख के साथ दुःख का होना भी लाजमी है | दुःख बड़े कम की चीज है | जिन्दगी मे अगर दुःख न हो तो कोई प्रभु को याद ही न करे | " | |||
| " दुनिया मे रहते हुए दो चीजो को कभी नहीं भूलना चाहिए | न भूलने वाली चीज एक तो परमात्मा तथा दूसरी अपनी मौत | भूलने वाली दो बातो मे एक है - तुमने किसी का भला किया तो उसे तुरन्त भूल जाओ | और दूसरी किसी ने तुम्हारे साथ अगर कभी कुछ बुरा भी कर दिया तो उसे तुरन्त भूल जाओ | बस, दुनिया मे ये दो बाते याद रखने और भूल जाने जैसी है | | |||
| " जैनियों के पास महावीर स्वामी का बढ़िया मॉल लेकिन पेकिंग घटिया है जबकि जमाना पेकिंग का है | जैन समाज या तो अपने मंदिरों के दरवाजे जन-जन के खोले या फिर महावीर को मंदिरों की दीवारों से निकालकर आम आदमी तक लाए, चोराहे तक लाए | चोराहे पर लाने से मेरा यह कहेना कतई नहीं है की मे मर्यादाओ से खेल रहा हू | मेरा तात्पर्य भगवान महावीर और उनके सन्देश को जन-जन के बीच ले जाने का है | " | |||
" मरने वाला मर कर स्वर्ग गया है या नर्क ? |
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" सूर्योदयके साथ ही बिस्तर छोड़ देना चाहिए , |
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" आज जैन समाज के सामने अपने को शाकाहारी बनाये रखने की सबसे बड़ी चुनोती है | |
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| " आज जैन समाज के सामने अपने को शाकाहारी बनाये रखने की सबसे बड़ी चुनोती है | महावीर के मोक्ष के बाद इन २५०० वर्षो मई जैन समाज कई बार बटा है | और बटवारा कभी दिगम्बर जैन -श्वेताम्बर जैन के नाम से तो कभी तेरापंथी जैन - बीसपंथी जैन के नाम से हुआ है | मगर अब जो बटवारा होगा वह दिगम्बर जैन - श्वेताम्बर जैन , तेरापंथी जैन - बीसपंथी जैन , स्थानकवासी जैन और मंदिरमार्गी जैन जैसे नाम से नहीं होंगा बल्कि 'शाहाकारी- जैन 'और ' मान्शाहारी - जैन ' के नाम से होंगा | अगर ऐसा हुआ तो याद रखना महावीर हमें कभी क्षमा नहीं करेंगे | " |
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| " माँ - बाप की आँखों मे दो बार ही आंसू आते है | एक तो लड़की घर छोड़े तब और दूसरा लड़का मुह मोड़े तब | पत्नी पसंद से मिल सकती है | मगर माँ तो पुण्य से ही मिलती है | इसलिए पसंद से मिलने वाली के लिए पुण्य से मिलने वाली को मत ठुकरा देना | जब तू छोटा था तो माँ की शय्यां गीली रखता था , अब बड़ा हुआ तो माँ की आँख गीली रखता है | तू कैसा बेटा है ? तूने जब धरती पर पहला साँस लिया तब तेरे माँ - बाप तेरे पास थे | अब तेरा फ़र्ज़ है की माता - पिता जब अंतिम सांस ले तब तू उनके पास रहे | " |
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" दान देना उधार देने के समान है | देना सीखो क्योंकि |
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| " पैसा कमाने के लिए कलेजा चाहिए | मगर दान करने के लिए उससे भी बड़ा कलेजा चाहिए | दुनिया कहती है की पैसा तो हाथ का मेल है | मैं पैसे को ऐसी गाली कभी नहीं दूंगा | जीवन और जगत मे पैसे का अपना मूल्य है , जिसे जुट्लाया नहीं जा सकता | यह भी सही है की जीवन मे पैसा कुछ हो सकता है , कुछ -कुछ भी हो सकता है , और बहुत -कुछ भी हो सकता है मगर 'सब-कुछ'कभी नहीं हो सकता | और जो लोग पैसे को ही सब कुछ मन लेते है वे पैसे के खातिर अपनी आत्मा को बेचेने के लिए भी तेयार हो जाते है | " |
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